Friday, August 12, 2011



यह ज़िंदगी जैसे 'कायल'
नदी के दो किनारे है

कभी हुए दूर यूँ की
सपने भी पराए हैं

फिर मिटे फ़ासले यूँ भी
एक मुक़द्दर दुआएं है

'मेज़ पर बिखरे वो कुछ काग़ज़
मेरी ज़िन्दगी या ख़त पुराने हैं?'



“हंसते हो क्यूँ हर बात पर मेरी, कहा उसने
एक मुठ्ठी मे हाथ, दूजी मुठ्ठी में रेत भीच के”

Tuesday, August 09, 2011

दस्तूर-ए- दुनिया
अजब हो गया

खून बहाने वाला बेवफा,
चूसे, वो समझदार हो गया


बलात्कारी थे सारे बेगुनाह
शोषित गुनहगार हो गया


आज़ादी गयी, हवा-पानी गया
आदमी इतना लाचार हो गया

जिस अहल-ओ-अयाल पर तुझे था गुरूर
उसी सूली पर तू हलाल हो गया

तोड़ दे यह ज़ंज़ीरें गुलामी की अब
आज़ादी का साठवाँ साल हो गया

थोड़ा परवान दे अपनी आवाज़ को
मुल्क, चौराहों पर नीलाम हो गया

थोड़ा तो खून को दे अपने उबाल
रूह पर रिश्वतखोरी का इल्ज़ाम हो गया

मेरे ज़मीर अब तो करवट ले
हल रिक्शों पर सवार हो गया

मेरे ज़मीर अब तो करवट ले
बचपन भूखा-नंगा बेहाल हो गया

मेरे ज़मीर अब तो ले करवट 
रंग-ए-दहशत पुतलियों का लाल हो गया

उठ जला शमा दे चुनौती रात को
ज़मीन-ए-आफताब पे अंधेरो का राज हो गया

आम आदमी तुम क्यू इतने आम हो
अब तो आम भी महँगा हो गया

“मेरी लड़ाई तो अंधेरे के खिलाफ थी
वो शमा बुझते रहे, मैं जलाता रहा”




Tuesday, August 02, 2011

आज सन्नाटे टूटे हैं

सच तुम सुन नही पाते
झूठ हम कह नही पाते

फिर कशमकश मे
गुम्सुम शाम बीती है

फिर हमने शोर से
दामन बचाया हैं

आज फिर रात को
सन्नाटा छाया हैं

तूफान के पहले के पलों मे
फिर हमने दिल को समझाया हैं

सब ठीक हैं इस धोखे मे
सारा जीवन बीताया हैं

लेकिन अब ना कश्मकश  हैं
ना तुम्हे खोने का डर हैं

आज कई दिनों के बाद
मैने आप को पाया हैं

आज सन्नाटे टूटे हैं
आज तूफान आया हैं

इस सैलाब मे बह गये
ख्वाब कई, रिश्ते कई

इस सैलाब मे बह गये
खुशियों के ख्याल कई

इस सैलाब मे बह गये
मेरे सब्र के बाँध कई

बह गये, इस सैलाब मे
चुप पलों के, अरमान कई

इस सैलाब मे बस मेरा
ज़मीर बच पाया हैं

आज पहली बार तुमसे दूर
मैं खुश हूँ

आज कई दिनों के बाद
मैने आप को पाया हैं

इन आँसुओं की बारिश मे
मेरा ज़मीर साफ हो आया हैं

इन आँसुओं की बारिश मे
मेरा ज़मीर साफ हो आया हैं

आज सन्नाटे टूटे हैं
आज तूफान आया हैं

आज सन्नाटे टूटे हैं
आज तूफान आया हैं


बसाए थे कई काफिले सपनो के
आज ना सपने, ना काफिले है

निकल आया हूँ दूर मैं कहीं
अब ना मंज़र, ना नज़ारे हैं

सफ़र अकेले इन रातों मे 'कायल'
मेरे साथी तो बस सितारे हैं

एक सराब-सी यह ज़िंदगी
रेगिस्तान, कहाँ साहिल-किनारे हैं

साहिल की रेत पर लिख रहा हूँ
अपना मुक़द्दर हर रोज़ जैसे

इसमे जीतना  'कायल'
न नसीब हमारे  हैं?

सुबह से शाम, शाम से रात
फिर सूरज,एक नया दिन

नये मौसम, नये लोग
लोगों के नये मिज़ाज़

मिज़ाज़ओं की उँछ-नीच
ज़हन मैं कुछ यादें

ज़िंदगी, यह सफ़र
कई काफिलों मे

हम आए थे कहा से
इसके क्या मायने हैं

रोकर आना रुलाकर जाना
हंसकर अलविदा, दस्तूर ज़िंदगी

सिमट गयी है सोच या
सिमटा सोच के दायरों मे

'यह बात अच्छी हैं लेकिन'
यह ना कहना

अभी इन बातों के
कुछ मायने हैं

# सराब= mirage