Friday, February 07, 2014

the pain, the honey...

i know you not from days many
i feel a pain in my heart uncanny

like a spear in my heart
it aches over small things
laugh u may aloud
i sound fool already!

oh! the pain, intoxicating honey
you may or may not accept me
i m yours already

long have i seen from distance
these emotions steady
Today, i dissolve me in many


Wednesday, August 07, 2013

ज़रूरतों को रिश्तों मे बदलना नही आया
हाँ, मुझे समझौतों का हुनर नही आया

मैं पत्थर हूँ पानी नही
किसी भी शॅक्ल मे ढल जाउ
खड़ा रहा तूफ़ानो मे
दरारों से रिसना नही आया

रौंदा असफलताओं ने कई बार
उठ खड़ा हुआ हर बार,
की मुझे ज़मीन पर
पड़े रहना नही आया

ज़रूरतों को रिश्तों मे बदलना नही आया
हाँ, मुझे समझौतों का हुनर नही आया

कल रात को
जब मैं तन्हा था,
कैसे कह दूं की
तुम्हारा ख़याल नही आया!

ज़रूरतों को रिश्तों मे बदलना नही आया
हाँ, मुझे समझौतों का हुनर नही आया

Tuesday, July 30, 2013

हज मे हाज़ी हो जाते है
क़व्वालों मे क़व्वाली हो जाते है
साहेब हम आलू हैं
की हर सब्ज़ी मे काम आते है

Monday, July 29, 2013

echoes of the past

the echoes of the past
that still haunt me
will they haunt me forever?
will they follow me for ever?
the higher i reach, the lower i fall..
the farther i travel or
keep myself locked 
how long would they groom
my past, present, future...


or am i in love with this haunting
like a horror movie
can't let go the dream
which don't let me sleep
challenges that push me
over the genius cliff...
become the passion
that drives me in

one dream after another
some haunt me and
some i can't let go
like an endless orgy of illusion
life has been

Difficult it is
to see beauty
& not want it

Irrestible it is
to hear a bird
and not cage it

to smell flower
& not bottle it

to taste honey
& not again crave it

But even more difficult it is
to love somebody
& yet not want her

Be empty and hollow
& yet have feelings..

Thursday, February 28, 2013

न दाना है ना आना है
ये भी क्या ज़माना है
सुर है पर अल्फ़ाज़ नही
जैसे कोई तराना है
फकीरी मे भी 'कायल'
एक सुख होता है
जैसे रेगिस्तान मे बदल
ना बरसना है ना आना है
दरिया दिल तो बस एक वो है
बाकी हमने सबकी इंतेहा देखी
लोगों का आना है 
अफ़सोस जताना है जाना है 
न दाना है ना आना है
ये भी क्या ज़माना है

"पूछो ना की हमने क्या क्या देखा,
ये पूछो की हमने क्या न देखा"

Friday, February 22, 2013


अब कहे क्या की किसकी खता थी
और क्या हादसे हो गये,
कभी निकले वो बेवफा
कभी हम बेवफा हो गये
वो छीन लेता है छ्त मुझसे
मुझको आसमान देने के लिए
और मैं रोता रहता हूँ
इन चार दीवारों में अपनी
कुछ और सामान के लिए

मैंने काट दिए पेड़ सारे
कुछ चौड़ी सडकों, तेज़ गाड़ी
कांच के मकान के लिए 
चिड़ियाँ कीट मार दिए
कुछ पेट की आग के लिए
कुछ 'विज्ञान' के लिए 
'सभ्यता' अच्छी बात है 'कायल'
पर इसमें जगह कहाँ है?
 खुले आसमान के लिए
जहाँ के लिए ?
हैं सिर्फ दीवारे ही दीवारें
इंसानों  के लिए

अब कहे क्या की किसकी खता थी
और क्या हादसे हो गये,
कभी वो बेवफा निकले
कभी हम बेवफा हो गये
कुछ शैतानी पलों में इंसान रहे
कुछ इंसानी पलों में शैतान रहे
कभी- कभी  भगवान्  भी रहे
आज फिर अपनी फितरत से परेशां रहे 
मैं उसकी रुबाईय़त पढ़कर भी
उसको न जान पाया हूँ  
कभी ज़बान समझ
न पाया हूँ
कभी इंसान समझ
न पाया हूँ
या अपने अंतर में
न उतर  पाया हूँ



Wednesday, February 06, 2013

मैं कुछ गानों से
कुछ तानों-बानों से
डरने लगा हूँ
हाँ मैं प्यार करने से
डरने लगा हूँ

वो दिन और थे
जब चलता था
बाज़ी शहंशाहों सी 
अब मैं प्यादों सा
चलने लगा हूँ
हाँ, मैं प्यार करने से
डरने लगा हूँ

ऐसा नहीं की अब मुझे
विश्वास नहीं मार्क्स पर
स्मिथ या और आदर्शों पर
बात बस इतनी है की
मैं इंक़लाब से
चिढने लगा हूँ
हाँ, मैं प्यार करने से
डरने लगा हूँ
मुझे पता है इंसानों में
राम-रहीम बाकी है
चिरागों में  यकीं  की
लौ अभी बाकि हैं 
बात बस इतनी है
फतवों- वनवास से
सिहरने लगा हूँ
 हाँ, मैं प्यार करने से
डरने लगा हूँ 
आज बढ़ा है पाप तो
हर इंसान के हाथ में
न्याय का तराजू है
बात बस इतनी की
मैं इन आखों में
धधकती आग से
डरने लगा हूँ   
 हाँ, मैं प्यार करने से
डरने लगा हूँ
जानवर खाकर, आदिवासी भगाकर
पेड़ काटकर, पहाड़ खोदकर
हमने तार बनाये है
इन तारों पर लटकती लाशों से
डरने लगा हूँ
हाँ, मैं प्यार करने से
डरने लगा हूँ

 हाँ मैं डरने लगा हूँ
हर बात से जज़्बात से
जीत से हार से
नफरत से, प्यार से

अब  हर बात से
डरने लगा हूँ  
जैसे तस्सवुरों में अपने
क़ैद होने लगा हूँ
कोई उठाता है
तो उसे अलार्म सा
snooze कर देता हूँ
और सोता हूँ
तो सपनो से
उठता हूँ
तो अपनों से
डरने लगा हूँ
अपने ही वजूद से
सिहरने लगा हूँ
हाँ, मैं प्यार करने से
डरने लगा हूँ

'कायल' मियाँ तुम भी अजब इंसान हो
मुनाफ़िक़ हो और फरेब से डरते हो
# मुनाफ़िक़ = hypocrite

 



Wednesday, January 23, 2013

On new education Policy

लकड़ी बिना दबाव और थोड़े ही तापमान
पर राख बन जाती है
कुछ देर भारी दवाब और तापमान 
पर ग्रॅफाइट बन जाती है
और थोड़ी देर और दबाव और तापमान
पर हीरा बन जाती है
अगर ये परिमंडल न हो
तो लकड़ी, लकड़ी रह जाती है
पानी-बरसात में
गल जाती है 
पर तनाव  भी घताक इसमें
लकड़ी बिखर जाती है
कीटो द्वारा
चट कर दी जाती है 

अतः दबाव तनाव न बने
इसके लिए एक अनुशाशित आधार पद्धति
मिटटी की तरह पकडे जो लकड़ी को
 आवश्यक हो जाती है 
जो तय है दीवालों पर लटका दिए जाना
तो कोशिश चित्रकार बने, इश्तेहार न बने

बने तो हम न जाने क्या क्या तेरे प्यार में
और उन्हें शिकायत थी की हम पहेले से न रहे

तेरी शिकायत भी जायज़ है दिल--ए-कचहरी का फ़ैसला
खुद ही अर्जी की, गवाही दी और सूली चढ़े

ये अच्छे-बुरे के बीच की रेखा और तुम  'कायल'
बताओ ज़रा, बिना खाक के कायनात कैसे बने ?


"मेरे हाथ की लकीरे साफ़ है ये इत्तेफ़ाक नहीं
हम कितना उल्ज़े है की अब सुलझे है"

Sunday, December 30, 2012

रोटी

खुशियों की मुफ़लिसी मे मर गये ख्वाब
रात को भूखे पेट, मुंह लटकाए
ताकते रहते है चाँद को
अपनी फिलोसफी के
फटे कपड़ों मे टॅक टॅकी लगाए
और फिर चाँद अचानक लगने लगता है 'रोटी'
आँखों से खाकर,  भर लेते है मन
पर पेट की आग कैसे बुझे?
इंतेज़ार सुबह का, सूरज का
उसकी आग से, कम से कम
इस जिल्द की भूख मिटे
और मैं सो जाउ इस तरह
जैसे सड़क का कुत्ता
रात भर अपनी ही गली मे भौंकने के बाद
धूप की गर्माहट मे सड़्क किनारे, बेफ़िक्र

की एक और भूखी- ठंडी रात
मेरा इंतज़ार कर रही है


'मुर्गा'

आवाज़ उठाना अच्छी बात है
पर हर आहट पर भौंकने वाला
कुत्ता  हो जाता है
कुत्ता होना भी अच्छी बात है
की वो हद से गुज़रने पर
काट ख़ाता है
बुरा है मुर्गा हो जाना
जो हलाल होने से पहले
बहुत शोर मचाता है
पर काट नही ख़ाता
शायद उसका 'शाकाहार' ही
उसे 'मुर्गा' बनाता है

Thursday, December 20, 2012

पलना

सुबह सैर से आते हुए
अपनी ही धुन मे
अक्सर सड़क पर
'आवारा' कुत्तों को
पुचकार देता हूँ
और वो भी
प्यार के भूखे
मुझ पर यूँ चढ़ने लगते है
जैसे हमारा
कई सालों का साथ हो
प्यार के एक पल के लिए
अपना सारा अभिमान
कर्तव्या का गुमान
त्याग कर
बस खो जाते है
प्रेम के उस एक क्षण मे

बड़े-बड़े घरों
की सलाखों से झाँकते हुए
छतों से आधे लटके हुए
'पालतू' कुत्ते
बस भोखते ही रहते है
दूसरे कुत्तों पे
आदमियों पे, गाड़ियों पे
कितना भी पुचकारो
पास नही आते
हमे अपना नही मानते-जानते
अपनी संपूर्णता की मृगतृष्णा मे
'पाले' जाते है

इंसान भी एक उम्र के बाद
'आवारा' से 'पालतू' हो जाता है
और हो जाता है 'खुखार'
अपने ही मान अपमान की छतों पे चढ़कर
भोक्ता रहता है
छूट नही पाता अपनी ही ज़ंज़ीरों से
कोई करना चाहे प्यार
तो पास नही आता
'अपनी' ही सलाखों मे
क़ैद हो जाता है
या यूँ कहे
'पलने' लग जाता है

Monday, December 10, 2012

वो तुलसी का पौधा

मेरे आगन का वो तुलसी का पौधा
जो माँ लाई थी घर से
जिसे बड़े जतन से
माँ ने मेरे आँगन मे था बोया
पुछा था
सूखा तो ना दोगे?
और मैं मुस्कुराया था!

हाँ वही तुलसी का पौधा
जिसे मैने रोज़ पूरी श्रद्धा से
पानी दिया था
वही तुलसी का पौधा
जिसने अकेले वक़्त मे
मेरा साथ दिया था
वही तुलसी का पौधा
जिसकी पवित्रता पर
मैने विश्वास किया था

घर गया कुछ दिनो के लिए
माँ से मिलने सौपकर लोगों को
अपना तुलसी का पौधा

आया आज तो देखा
वो तुलसी का पौधा
सुख गया है

मेरी ही ग़लती है
मुझे समझना चाहिए था
अपने तुलसी के पौधे
दूसरों की श्रद्धा पर उगाए नही जाते
लोग दे जाए शर्मिंदा होकर नये पौधे
पर उन्हे हम अपना बना नही पाते

अब रोज़ उसे पानी देता हूँ
की उग जाए, उग जाए
पर सूखे हुए पौधे
खड़े रहते है
टूटते नही, उगते नही
रहते है
एक कंकाल की तरह
अपनी ज़मीन को शमशन किये

काट भी दिया जाए
तो उसकी जड़े गढ़ी
पकड़ी रहती है मिट्टी को
छोड़ती नही
अगर उखाड़े जड़ से
तो भी एक गद्दा रह जाता है
गर छुपाउ गद्दे को
तो मिट्टी भुर्भुरी रह जाती है
उस पर क्या नया पौधा जड़ पकड़ पाएगा?
क्या मैं उसी विश्वास के साथ
मन मे फिर तुलसी संझो पाउँगा?
या दब के रह जाऊंगा 
एक ग़लती के बोझ तले?

यही सोच तने को काट देता हूँ
जड़ों को गढ़ा रहने देता हूँ
की शायद वक़्त के साथ गल जाए
ज़मीन कुछ और उपजाउ हो जाए..
शायद अगली बरसात मे
उसी तुलसी का कोई बीज उग आए

Saturday, November 24, 2012

लाश

अब तुम्हारे और मेरे बीच
एक दीवार है
दीवार के एक और हो तुम
दूजी ओर मैं और एक लाश
लाश हमारे रिश्ते की
जिसके साथ मैं सोने जाता हूँ
जिसके साथ सुबह
आप को बिस्तर पर पाता हूँ
जिसे मैं ढो रहा हूँ
हर जगह हर वक़्त
अब इस के वज़न से
मेरे ज़हन पर
नासूर हो गये है
और है अंदर एक आग
कहीं यह आग
इस लाश को जाला ना डाले
और पहुँच जाए तुम्हारे पास
दीवार के उस पार 
तुम्हारी दुनिया भी
मेरी तरह ज़ुलस ना जाए
इस लिए सोच रहा हूँ
की अब इस लाश को
दफ़नाया जाए
इस पर खुशियों का
एक पत्थर लगाया जाए
कभी इस पर फूल
कभी एक आँसू बहाया जाए
और फिर सब कुछ भूलकर
इस कब्र से,
ज़िंदगी! वापस लौटा जाए

चलती भीढ़ को देख के
अक्सार सोचा करता हूँ
अकेला, ठहरे पानी सा
चुनिंदा हू? गंदा हू?

Thursday, September 20, 2012

नक़ाब

यूँ शदीद ज़हन लिए फिरता है
आसमान का वज़न लिए फिरता है
(शदीद = violent)

एक तूफान है आँखों मे लिए
होठों पे मुस्कान लिए फिरता है

मसले जहाँ के अपने किरदार मे पिरोए
अब इसे फ़ितरत कहे फिरता है
(फ़ितरत = human nature)

खो गया उलझ गया है  कुछ इस तरह
अच्छाई को अब फरीब-ए-नज़र कहे फिरता है
(फरीब-ए-नज़र = illusion)

चाहता है हर कोई बस पल दो पल चैन
पर सुकून के मायनों पर जिरह किए फिरता है
(जिरह = debate)

हे खुदा, भगवान, येशू, इससे गले लगा ले
यह बहुत अकेला है, मेरा और मैं की लड़ाई मे
जैसे एक खाई है इसकी तन्हाई मे
खाई मे अपना ही वज़न लिए उतरता है
जिरह करता है हंसता है रोता है
क़ैद को अपनी फ़ितरत, फरीब ए नज़र करता है
मायने बनाता है, मायनों पर सवाल उठाता है
सवाल जवाब की खाई मे धस्ता जाता है
पागलों की तरह ठहाके लगता है
फिर सो जाता है थक के
क्यूंकी नींद मे खाई तो होती है
खाई का अंदाज़ा नही होता तन्हाई नही होती
होते है जज़्बात, और मायने भी
पर इन पर कोई सवाल नही होता जिरह नही होती
होता है हॉंसला की सुख दुख
इन्ही सपनो मे गुम जाएँगे
कुछ पल के लिए ही
हम सच्चाई से बच पाएँगे
पर सपना पानी के बुलबुले की तरह
कब तक रह पाता है सह पता है
अपनी उम्मीदों का दबाव
टूटती है नींद चौक्कर उठ जाता है

कुछ नूकों के दरमियाँ जैसे
एक बवंडर हुए फिरता है
(नूकों = points)

यह अपने ही ख़यालों के खंजारों से
अपने ज़हन को घायल किए फिरता है

यूँ शदीद ज़हन लिए फिरता है
आसमान का वज़न लिए फिरता है

एक तूफान है आँखों मे लिए
होठों पे मुस्कान लिए फिरता है

बस यहाँ तहज़ीबों का फ़र्क है 'कायल'
हर शक़्श कई 'नक़ाब' लिए फिरता है