Wednesday, December 14, 2011

leaving the past
beyond the future
standing in present
losing concepts of existence
here i am calm
in pure silence

firm from attraction
steady in repulsion
related yet de attached
life without obsession
here i am harmonized
with melodies of creation

i rest in peace
in you i am
you in me
in this bliss
beyond delusions
in pure wisdom
    

Thursday, September 08, 2011


                 प्रवाह
                     I
एक कुत्ते का बच्चा नाम था कालू
मनचला  गबरू जैसे छोटा भालू

रहता सड़क किनारे,  टूटे बोर्ड के नीचे
उसके बहन-भाई  चपलु-शालु

नटखट प्यारा चुलबुला जोशीला
शीला – चुलबुल से रंगीला कालू

संभाव से सबको छेड़ता हैं
खाने से ज़्यादा प्यार का भूका हैं

हर पल मैं अरमान हैं कितने
दुनिया मैं शक्श हैं जितने

यह बिना रीश्तों के प्यार दे रहा हैं
धूतकार सहकर फिर पीछे दौड़ रहा हैं

आ रहा हैं यूँ पीछे सबके
डुम हिलाकर कूद कूद के

नाकामियाबी पर बुलंद होता हैं
उत्साह उबलते दूध सा  हैं

कभी पैर चाट लेता हैं
कभी  कपड़े पकड़ लेता हैं

कभी  पैरों के बीच से निकल जाता हैं
फिर पैरों पर ही सो जाता हैं

माँ से सीखे थे प्यार के जो सारे नुस्के
बिना छल के दुनिया पर लूटा रहा  हैं

मेरा कालू मेरा भालू
जीवन का गीत गा रहा हैं

फिर चल देते जब खेल के लोग
फिर दो कदम पीछे चलता हैं

फिर  अहम का एहसास कहे या
वैराग्य,  अभिमान या ज्ञान

अपनी सीमाओं का
फिर नये केंद्र  ढूंढता हैं

फिर पूर्ण समर्पण करता हैं
गिर गिरकर जूड़ता हैं


यह टूकड़ो पर नही
प्यार पर पलता हैं

            II
वक़्त के बहाव मे
शायद सब बदल जाएगा

एक दिन यह कालू मेरा भालू
गुमसूँ  कालिया हो जाएगा

मानव की मानसिकता जान लेगा
अपनी  सीमाए बाँध लेगा  

ज्ञान उसके उत्साह मे
बाधक हो जाएगा

पहेला  लड़ेगा,  फिर रात को रोयेगा
फिर संवेदनहीनता मे संवेदनहीन हो जाएगा

देव से नर , नर से पशु हो जाएगा
यह कालू से कालिया हो जाएगा

वो कालिया जो बैठता है कार के नीचे
जिससे  बच्चे डरते हैं, कोई पास नही जाता

जो घुर्रटा हैं या मार ख़ाता हैं
प्यार की धूतकर नही ख़ाता

जो पलता है टूकड़ो मे
और जीत भी हैं टुकड़ों मे

जो बस लोगों को देखता है
अब महसूस नही करता

वो  कालिया जो
जीवन की  अनंत  संभावनाओ

से परे अपने कुछ
अनुभवों में सिमट गया हैं

या एक शब्द मे कहे तो
‘वयस्क’ हो गया हैं

ज़िंदगी को छोटा- छोटा कर
चलती  फिरती मौत हो गया हैं

मेरा नटखट कालू
बड़ा हो गया हैं

"भावों के बहाव को पलटना है
वक़्त के बहाव- प्रभाव को नही"


Friday, August 12, 2011



यह ज़िंदगी जैसे 'कायल'
नदी के दो किनारे है

कभी हुए दूर यूँ की
सपने भी पराए हैं

फिर मिटे फ़ासले यूँ भी
एक मुक़द्दर दुआएं है

'मेज़ पर बिखरे वो कुछ काग़ज़
मेरी ज़िन्दगी या ख़त पुराने हैं?'



“हंसते हो क्यूँ हर बात पर मेरी, कहा उसने
एक मुठ्ठी मे हाथ, दूजी मुठ्ठी में रेत भीच के”

Tuesday, August 09, 2011

दस्तूर-ए- दुनिया
अजब हो गया

खून बहाने वाला बेवफा,
चूसे, वो समझदार हो गया


बलात्कारी थे सारे बेगुनाह
शोषित गुनहगार हो गया


आज़ादी गयी, हवा-पानी गया
आदमी इतना लाचार हो गया

जिस अहल-ओ-अयाल पर तुझे था गुरूर
उसी सूली पर तू हलाल हो गया

तोड़ दे यह ज़ंज़ीरें गुलामी की अब
आज़ादी का साठवाँ साल हो गया

थोड़ा परवान दे अपनी आवाज़ को
मुल्क, चौराहों पर नीलाम हो गया

थोड़ा तो खून को दे अपने उबाल
रूह पर रिश्वतखोरी का इल्ज़ाम हो गया

मेरे ज़मीर अब तो करवट ले
हल रिक्शों पर सवार हो गया

मेरे ज़मीर अब तो करवट ले
बचपन भूखा-नंगा बेहाल हो गया

मेरे ज़मीर अब तो ले करवट 
रंग-ए-दहशत पुतलियों का लाल हो गया

उठ जला शमा दे चुनौती रात को
ज़मीन-ए-आफताब पे अंधेरो का राज हो गया

आम आदमी तुम क्यू इतने आम हो
अब तो आम भी महँगा हो गया

“मेरी लड़ाई तो अंधेरे के खिलाफ थी
वो शमा बुझते रहे, मैं जलाता रहा”




Tuesday, August 02, 2011

आज सन्नाटे टूटे हैं

सच तुम सुन नही पाते
झूठ हम कह नही पाते

फिर कशमकश मे
गुम्सुम शाम बीती है

फिर हमने शोर से
दामन बचाया हैं

आज फिर रात को
सन्नाटा छाया हैं

तूफान के पहले के पलों मे
फिर हमने दिल को समझाया हैं

सब ठीक हैं इस धोखे मे
सारा जीवन बीताया हैं

लेकिन अब ना कश्मकश  हैं
ना तुम्हे खोने का डर हैं

आज कई दिनों के बाद
मैने आप को पाया हैं

आज सन्नाटे टूटे हैं
आज तूफान आया हैं

इस सैलाब मे बह गये
ख्वाब कई, रिश्ते कई

इस सैलाब मे बह गये
खुशियों के ख्याल कई

इस सैलाब मे बह गये
मेरे सब्र के बाँध कई

बह गये, इस सैलाब मे
चुप पलों के, अरमान कई

इस सैलाब मे बस मेरा
ज़मीर बच पाया हैं

आज पहली बार तुमसे दूर
मैं खुश हूँ

आज कई दिनों के बाद
मैने आप को पाया हैं

इन आँसुओं की बारिश मे
मेरा ज़मीर साफ हो आया हैं

इन आँसुओं की बारिश मे
मेरा ज़मीर साफ हो आया हैं

आज सन्नाटे टूटे हैं
आज तूफान आया हैं

आज सन्नाटे टूटे हैं
आज तूफान आया हैं


बसाए थे कई काफिले सपनो के
आज ना सपने, ना काफिले है

निकल आया हूँ दूर मैं कहीं
अब ना मंज़र, ना नज़ारे हैं

सफ़र अकेले इन रातों मे 'कायल'
मेरे साथी तो बस सितारे हैं

एक सराब-सी यह ज़िंदगी
रेगिस्तान, कहाँ साहिल-किनारे हैं

साहिल की रेत पर लिख रहा हूँ
अपना मुक़द्दर हर रोज़ जैसे

इसमे जीतना  'कायल'
न नसीब हमारे  हैं?

सुबह से शाम, शाम से रात
फिर सूरज,एक नया दिन

नये मौसम, नये लोग
लोगों के नये मिज़ाज़

मिज़ाज़ओं की उँछ-नीच
ज़हन मैं कुछ यादें

ज़िंदगी, यह सफ़र
कई काफिलों मे

हम आए थे कहा से
इसके क्या मायने हैं

रोकर आना रुलाकर जाना
हंसकर अलविदा, दस्तूर ज़िंदगी

सिमट गयी है सोच या
सिमटा सोच के दायरों मे

'यह बात अच्छी हैं लेकिन'
यह ना कहना

अभी इन बातों के
कुछ मायने हैं

# सराब= mirage

Sunday, July 31, 2011

जो उठे दिल मे आह आँसू बने
जो आँसू बहते रहे यूँही साहिल बने

जो उठे साहिल गफील सैलाब बने
झुका ज़माना दिल की करवट तले

सैलाब से फिर आह, आँसू, साहिल बने
तबाही का मंज़ार हम कब तक बने!

जो उठे दिल मे आह हँसी बने
कुछ तेरे कुछ मेरे लबों पे सजे

जो गिरे आँसू साहिल न बने
साहिल समंदर बने, गफील न बने

दुनिया मे तबाही के मंज़र बहुत
'कायल' आह तेरी सैलाब न बने

अपनी सिसकियों को बना खूबसूरत इतना
कोई शायर सुने, वाह कह दे

चिराग जले दिन-रात काजल बने
हम जले तिल-तिल 'कायल' बने



गफील = unaware
उनकी धूप मे खिले से
अपने कीचड़ मे सने से
सामने उनके कमल से
जल मे जले से

Monday, May 16, 2011

कफस

जब भी मैं देखता हूँ
इस ओर से उस ओर तक
क़ैद हूँ कल्पना के दायरे में
इस कफस से उस कफस तक
सच्चाइयाँ अपने वजूद की
इस अनुभूतित कल्पना से स्वप्न तक
जब भी मैं देखता हूँ
इस कफस से उस कफस तक

गिरकर, उठकर, संभलकर चलना
इस अंधकार से उस उजाले तक
थककर लौट जाना आशियाने में
इस उजाले से अंधकार तक
अंधेरे-उजाले की कशमकश में
इस आलसमय इंतेज़ार से उस आशा तक
जब भी मैं देखता हूँ
इस कफस से उस कफस तक

आशा का इंतेज़ार भी एक आशा हैं
कफस से निकालने का संघर्ष भी कफस हैं
हर कशमकश के अंत में
एक और कशमकश हैं
सोच, क़ैद हूँ कल्पना के दायरे में
इस ओर से उस ओर तक
इस कफस से उस कफस तक
अनुभूतित कल्पना से स्वप्न तक

[कफस= cage]

Friday, March 11, 2011

‎'patch ups', hanging, 'versions'.
discovered new places of 'history'!
unwanted programs eating resources
not working again?
'restart'
relationship or windows?
Or new OS?

Saturday, February 26, 2011

barf ka gurur utra ja raha hain
uska pasina paani hua ja raha hain

hum kehte the jisse apna
woh jaise paas aake door jaa raha hain

dukh yeh nahi ki woh jaa raha hain
yeh ki apni yaadein bhi saath le ja raha hain

ek hi chehra tha duniya main humari
ab duniya ka ek chehra hua jaa raha hain

barf ka gurur abb utra jaa raha hain
uska pasina paani hua jaa raha hain

Thursday, February 24, 2011

jo pathar khak main pada
wo thokaron main, khaksar hain

jo pathar khano main ja chupa
woh aaj tajo paar sawar hain

woh kehte hain humme dewana
duniya ko tamam pagalpan sawar hain

abb kahe kisse accha-bura
apne dost hi chaar hain

kya kare 'kayal'? haar kirdaar yaha
apni zaruaraton ka shikar hain!

Sunday, February 13, 2011

saccha isqh hain khuda ki tarah
hota bhi hain dikhta bhi nahi.....

Thursday, January 27, 2011

zindagi se zindagi ka safar
armaano main dafn hua dam nikla
phir bhi hasi thi labon par
ki mera zanaza jo nikla, khoob nikla

Friday, January 07, 2011

hum toh parwane hain humari hasti kya
lau jale jal jaana lau bhujhe bujh jana
ghalib tere sher o shahar ke
alag alag andaz
ek sunne wah wah kahe
duja nikal aah
o re panchi tujhe ghonsle se itna pyar kyu hain
apne hi dayaron main qaid mann, itna daagdar kyu hain

Thursday, December 30, 2010

Hum mil bhi sakte the, paar kya kare ‘kayal’

Kuch tum nahi badle, kuch hum bhi ziddi the

maa kehti thi bachpan main
bhay-sahas ke yudh main
jeet sada hoti hain sahas ki

jab thoda bada hua toh padha
toh padha ganit main
ki iski prayikta (probability) hoti hain adhi

jab thoda aur bada hua toh mahsus kiya
ki aisa hamesha hi ho jata hain
sahas jeet jata hain aur bhay haar jata hain

aaj bees saal baad yeh samjha hain
ki sahas asimit hain aur bhay simit
issliye hamesha jeet jata hain

jaane mahsus karne aur samajhne main
kitna waqt lag jata hain?
kabhi bees saal aur kabhi jeevan