Thursday, January 19, 2012

देखो नंगों की भीड़ नाचती 
कपड़ों की दुकानों में 

एक नंगा साहूकार बैठा 
कपड़ों के दीवानों पे 

बाहर बड़ा सा बोर्ड लगा था
'यहाँ नंगे प्रतिबंधित है'

समझ न आया बात क्या ये 
पहेली बड़ी अनोखी है 

है कपड़ों का ढेर लगा 
फिर क्यों जनता नंगी है 

था मेला सा नंगों का 
सब कहते थे 'कपडे पहनो'! कपडे पहेनो!'

एक नंगा कह रहा दूजे से 
वाह! क्या कपडे रंगीले तेरे है 

माँ बच्चों को सिखा रही थी
बेटा! देखो  ऐसे कपडें पहनते है 

कुछ नंगे अख़बारों में 
छेद बड़े बड़े करते है 

फिर अख़बारों को ओढ़ के कहते 
इन छेदों से दीखते नंगे है 

तभी शोर सुना 'कपडे पहने' 
'कपडे पहनने दे' कोई चिल्ला रहा है

खुद है नंगा और नग्नता पर 
प्रश्नचिन्ह लगा रहा है


हमने पुछा पास खड़े एक नंगे से
उसने कहा यह विचार इसके पुरखों के

फिर देखा तीन नंगों को, तीन नंगों ने 
नग्नता के जुर्म में सजा सुनाई है!

यह बात हमारे समझ में न आई 
तभी एक नग्न रिपोर्टर हमारे पास आई

तीन नंगों का न्याय किस प्रकार नग्न है?
इस बात पर हमसे टिपण्णी चाही 

सुनाई दिया की कोई मशहूर नंगा गा रहा है 
'कपडे लो, कपडे दो! कपडे लो कपडे दो!' 

तभी अचानक कहा किसी ने 
रुको! रुको! आप अन्दर कैसे आये है?

आये तो आये है पर इस प्रकार
नग्नता का नंगा नाच क्यों मचाये है

पता नहीं आपको क्या यह
यहाँ नग्नता प्रतिबंधित है 

हमने उन्हें समझाया की हे बंधू!
हमने तो कानून के मुताबिक कपडे पहने है

कहा उसने समझो मत अपने को चालक 
कानून के हाथ बहुत लम्बे है

हमने कहा कानून! 
मगर आप भी तो नंगे है 

धर दबोचा उसने हमें नग्नता के अपराध में 
रात भर खायी मार तो हुआ अंदाज़ा 


की वो कानून के बाशिंदे है 
और  हम भी कितने नंगे है 

सुना है इसका किया था 
कुछ नंगों ने विरोध प्रदर्शन


उन्हें न था हमसे-कानून-कपड़ों से लगाव 
उनका था बस विरोध के प्रति समर्पण 

वो चलते फिरते कंप्लेंट बॉक्स की तरह
रोज़ नारे लगते है, फिर थक के सो जाते है

एक बुज़ुर्ग हमें देख कर मुस्कुराये
'इतिहास' है  नाम उनका, बता पास आये


उन्हें भी नहीं याद की
वो इस शहर में कब आये


बताया हमको की यहाँ तुम्हारी तरह
कपडे वाले कई लोग आये


कुछ ने चिल्ला चिल्ला कर खुद को मार लिया
कुछ को चिल्ला चिल्ला के यहाँ के लोगों ने मार दिया


पर वो भी यह पहेली न सुलझा पाए
मैं आज भी नंगा हूँ


अपनी झुरियों के पीछे
अपनी लाचारी न छुपा पाए 


हमने उनकी बात मान ली
की कौन फालतू सर खपाए ?


अब यहाँ हम भी नंगे, तुम भी नंगे 
और नग्नता वर्जित है .....







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